शाम
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||हर शाम यादों का मेला लगता है,
बूढ़ी आंखों में इंतजार दिखता है,
बंजर जमीन पर आशिया का ख्वाब बनता है,
खतों में बेजान लफ्जों का शोर अब भी सुनाई देता है,
अब झुर्रियों में नाकाम मोहब्बत का तजुर्बा दिखता है,
कभी तुझे भुला ना कायम नहीं होता,
यूं ही शाम को यादों का मेला लगता है||

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