Jazba

कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए

वो जो है फ़िरक़ापरस्त

लोगों की आंखों के

नूर हो गए !


कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए ..


क़सीदे जो पढ़ते थे

खिदमत ऐ ख़ल्क़ के

हुक्मरा वो आज कितने

मग़रूर हो गए !


कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए ..


सदाक़त से इनका ना है कोई वास्ता

मुफलिसो से इनका ना है कोई राब्ता

फिर भी देखो आज

वो कितने मशहूर हो गये !


कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए ..


वो जो कहते थे

जीएंगे और मरेंगे

हम वतन के ही लिए

वो आज अपने ज़ाती फायदों

में ही मशगूल हो गए !


कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए ..

तमाम तलख़ी सह ली हमने

फैसले छोड़े खुदा पे

तभी देखो आज हम

कितने सबूर हो गए !


कैसे ये ज़माने के दस्तूर हो गए !

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1 Comment

  • bhoot hi umda shiraz sahaab.....

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