वो चार रोज़ थे जब रोज़ मिला करते थे,

कई रोज़ों से मुलाकात अधूरी सी है||


कई बातें थी जो तुझसे कही थी रुख़सत पर,

मगर जो दिल में रही बात अधूरी सी है||


मैंने हर सहर में इक शब को ढलते देखा है,

जो तेरे संग रही रात अधूरी सी है||



तू नहीं है यहाँ फिर भी तू राबता सा है,

इल्म होता है कोई याद अधूरी सी है||


-नूर