इन सितारों को मुट्ठी में भरूँ भी तो कैसे,

मैं ख़ुद से मोहब्बत करूँ भी तो कैसे||


ये रात जो पर्दा गिरा गई ग़ुनाहों से,

के जैसे हया भी सरक गई निगाहों से||

अब पाक़ साफ़ दामन करुँ भी तो कैसे,

मैं ख़ुद से मोहब्बत करूँ भी तो कैसे||


सुर्ख़ लबों की लाली अब फ़ीकी हुई है,

आँखों का कजरा भी धुल सा गया है||

है तार तार दामन सियूँ भी तो कैसे,

मैं ख़ुद से मोहब्बत करूँ भी तो कैसे||


घर में माँ शादी का जोड़ा सँभाले हैं,

बाबा ने दुआओं के सिक्के निकाले हैं||

उस चौखट पे दस्तक अब करूँ भी तो कैसे,

मैं खुद से मोहब्बत करूँ भी तो कैसे||


मेरे मान और ग़ुरूर को रौंद कर गए जो,

मेरे अरमान अपनी हवस में झोंक कर गए जो||

उन चेहरों को ओझल करूँ भी तो कैसे,

मैं खुद से मोहब्बत करूँ भी तो कैसे||


कुछ फ़र्ज़ अभी बाक़ी हैं जो अपनों से निभाने हैं,

कुछ कर्ज़ सियाहकारों के जो सूत समेत लौटाने हैं||

ये मुक़म्मल किए बिन मरुँ भी तो कैसे,

“नूर” अब तुझसे मोहब्बत करुँ भी तो कैसे||