मैं कितने ही घरों को रोशन करती हूँ,

वो मुझे पल पल बे-झिझक जलाते हैं|


मैं उनके अंधेरों में भी पिघलती हूँ,

वो जाने क्यूँ मुझे मोम बनाये जाते हैं|


मैं बेवजह उनको खुशियाँ दे जाती हूँ,

वो मेरा होना भी बेवजह बताते हैं|


मैं उनके गुरूर के नीव की तरह हूँ,

वो मेरा गौरव भी छीने जाते हैं|


मैं पराये घर को भी अपना घर बनती हूँ,

वो मेरे ही घर में मुझे पराया बताते हैं|


मैं न जाने अपनों के लिए कितना बदलती हूँ,

वह अपने हो कर भी हर मोड़ पर बदलते नज़र आते हैं|


मैं कहती हूँ मेरा वजूद उनसे हैं,

वो हैं के मेरा अस्तित्व ही मिटाये जाते हैं|


मेरी खुदी मैं वज़ा-ए-ख़ुदा समझती हूँ,

वो ख़ुदा के बन्दे मुझे "लड़की" बताते हैं|